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माँ अपने ही बच्चोँ के सर पे बोझ हो गयी [कविता]

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माँ

उन बच्चोँ के सर से पिता का

हट गया जो साया था

अचानक अपने आप को सभी ने

मुफलिसी मेँ पाया था

माँ अपने आप को इस

परिस्थिती मेँ ढालती रही

अपना पेट काट उन

बच्चोँ को पालती रही

वही माँ आज सभी दुखोँ की

वजह ए दोष हो गयी

न जाने कैसे अपने ही बच्चोँ के

सर पे बोझ हो गयी

एक छोटे से कमरे मेँ सभी को

पाल कर बडा किया

नन्हीँ लताओँ हेतु आय का

स्तम्भ खडा किया

आज उन बच्चोँ के बडे घरोँ माँ के लिए

कोई न जगह थी

साथ माँ को अपने रखने की

कोई न वजह थी

अपनी ही माँ कैसे दुखोँ का

कोष हो गयी

न जाने कैसे अपने ही बच्चोँ के

सर पे बोझ हो गयी

दीपक पाँडे नैनीताल



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
October 22, 2013

धन्यवाद् आदरणीय योगेन्द्र जी

yogi sarswat के द्वारा
September 2, 2013

एक छोटे से कमरे मेँ सभी को पाल कर बडा किया नन्हीँ लताओँ हेतु आय का स्तम्भ खडा किया आज उन बच्चोँ के बडे घरोँ माँ के लिए कोई न जगह थी साथ माँ को अपने रखने की कोई न वजह थी अपनी ही माँ कैसे दुखोँ का कोष हो गयी न जाने कैसे अपने ही बच्चोँ के सर पे बोझ हो गयी समय की विडम्बना को सुन्दर शब्दों में लिखा है आपने !

harirawat के द्वारा
August 30, 2013

माँ अपने बच्चों के सर बोझ होगई, कुछ न कहा माँ ने उसने कुछ न कहा ! दिल को छूने वाली रचना के लिए धन्यवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

    deepakbijnory के द्वारा
    August 30, 2013

    dhanyawaad aadarniya harendra ji


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