CHINTAN JAROORI HAI

जीवन का संगीत

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जीवन मृत्यु का सच तीस वर्ष [कविता]

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तीस वर्ष पहले
यही सांझ थी
यही दरख्त था
यही गंगा का किनारा था
अपने पिता की उँगली थामे
मैँ एकमात्र सहारा था
मेरी दादी की अपने शरीर से रिहाई थी
ये उनकी अन्तिम विदाई थी
आज भी वही सांझ है
वही दरख्त है
वही गंगा का किनारा है
मेरी उँगली थामे
मेरा पुत्र एकमात्र सहारा है
मेरे पिता की अपने शरीर से रिहाई है
ये उनकी अन्तिम विदाई है
तीस वर्ष का यह फर्क भी
अजब रंग लाता है
विदा करने वाला विदा होता है
उँगली थामने वाला विदा करता है
विदा करने वाले की उँगली थामने
एक नया सृजन आता है
दीपक पाणडे J N V नैनीताल



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
October 24, 2013

धनवाद भानुप्रकाश जी ब्लॉग में पधारने hetu

deepakbijnory के द्वारा
October 23, 2013

धन्याद जैश्री जी ब्लॉग में आने के लिए तथा हसला बदने के लिए

Jaishree Verma के द्वारा
September 9, 2013

इतिहास स्वयं को दोहराता है बस चेहरे बदल जाते हैं ! भावपूर्ण याद deepakbijnory जी !

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 8, 2013

आपने जीवन की सच्चाई से रूबरू करा  दिया। बधाई। 


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