CHINTAN JAROORI HAI

जीवन का संगीत

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धर्म और संस्कृती

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पूजी जाती है तुलसी तो
चडता है धतूरा भी
पौधा हर एक औषधी से
भरा तो नहीँ है

आया था दर पे सीता के
साधू बन के वो रावण
हर एक संत के भेष मेँ
देवता तो नहीँ है

हो श्रद्धा औ विश्वास तो
पूजा भी जाता है पत्थर
वरना हर पत्थर एक दूजे से
जुदा तो नहीँ है

धर्म और संस्कृती का
अपना एक वज़ूद है
कथा वाचक की किसी ये
निजी धरा तो नहीँ है

देखता हूँ जो भी यूँ ही
लिख देती है लेखनी
वरना ये कवि कोई
मसखरा तो नहीँ है



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
October 20, 2013

dhanyawad singh sahab blog me aane ke liye

jlsingh के द्वारा
October 16, 2013

देखता हूँ जो भी यूँ ही लिख देती है लेखनी वरना ये कवि कोई मसखरा तो नहीँ है बहुत ही सुन्दर! आदरणीय दीपक जी!

deepakbijnory के द्वारा
October 16, 2013

ब्लॉग में आने हेतु धन्यवाद् aadarniya हरिश्चन्द्र जी

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
October 15, 2013

कवि   मसखरा    तो नहीं है    धर्म और संस्क्रति    का अच्छा अनुभव है 


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