CHINTAN JAROORI HAI

जीवन का संगीत

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अपने चालीसवें वर्ष पर

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चालीसवें साल का ये कैसा खुमार है
पतझर में नजर आ रहा बसंत बहार है
अज्ञान में पले
दरख़्त कट गए
अहम् के बादल
साथ साथ छंट गए
ज़हन के किसी कोने में
न कोई अन्धकार है
चालीसवें साल का ये कैसा खुमार है
कुछ भी न पा सका
न कुछ गवां सका
क्या साथ लाया था
जिससे रखता वास्ता
खाली हैं ये हाथ
सबका मिला है साथ
यही मेरी पगार है
चालीसवें साल का ये कैसा खुमार है
जीवन का मध्य है
नवीन गंतव्य है
भोर कि किरण से
मेरा तारतम्य है
नए आफताब की
तलाश में ये
घुड़सवार है
चालीसवें साल का ये कैसा खुमार है



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
December 7, 2013

dhanyawad yatindra ji

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 30, 2013

जीवेम शरदः शतम शुभकामनाओं सहित, सादर,

November 29, 2013

अच्छा आत्ममंथन है श्रीमानजी जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाईयाँ

    deepakbijnory के द्वारा
    November 30, 2013

    DHANYAWAAD AADARNIYA CHITRAKUMAR JI BLOG ME AANE KE LIYE DHANYAWAD

sadguruji के द्वारा
November 28, 2013

“नए आफताब की तलाश में ये घुड़सवार है चालीसवें साल का ये कैसा खुमार है” बहुत अच्छी कविता.बधाई.

    deepakbijnory के द्वारा
    November 28, 2013

    dhanyawad aadarniya sadguru ji


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