CHINTAN JAROORI HAI

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पीड़ा गर घर में मेरे मेहमान न होती

Posted On: 19 Feb, 2014 Others,कविता,Junction Forum,Contest में

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सुख का तनिक भी मुझे
अहसास न होता
पीड़ा गर घर में मेरे
मेहमान न होती

वो परिंदा कैसे पेड़ पर
बना पता घरौंदा
आसमानो की अगर
उड़ान न होती

आस्था और श्रद्धा ही
समाज की बुनियाद हैं
हर कोई मूरत यूँही
भगवान न होती

होता न सवेरा
ये मधुर
शाम न होती
ये रात अगर अंधेरों
पे मेहरबान न होती

न आती सर्द हवा
और न होता ये पतझर
बागान को बसंत की
पहचान न होती

बागबान के ही हाथों
मसले जाने से
बच ही जाती वो
जोश में गर इस कदर
नादान न होती

आज भी देवी कि तरह
पूजी जाती हर नारी
समझी जाती महज
जिस्म की दुकान न होती

काटकर फनकार की उँगलियाँ
कर दी यहीं दफ़न
वर्ना ये ईमारत भी यूं
आलीशान न होती

सो जाता वो भी
बदहवास
चादर को तानकर
बेटी जो उसके घर में भी
जवान न होती

धर्म की ही आड़ में
जो न होता कत्लेआम
गाँव की ये गलियां
यूं वीरान न होती

दीपक पाण्डेय
नैनीताल



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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
April 9, 2014

धन्यवाद आदरणीय आशुतोष जी कविता पर मंथन के लिए

अति सुन्दर.सार्थक यथार्थ से परिपूर्ण रचना के लिये बधाई स्वीकारे..सादर आभार..

    deepakbijnory के द्वारा
    March 10, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA SHILPA JEE

ashokkumardubey के द्वारा
February 28, 2014

बहुत खूब बिजनौरी जी आपने मन को छू लेने वाली पंक्तियाँ लिखीं हैं मैं तो आपका फैन हो गया धन्यवाद बधाई

mrssarojsingh के द्वारा
February 26, 2014

बहुत सुंदर रचना . बधाई दीपक जी ,,,,,,,

    deepakbijnory के द्वारा
    February 28, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA SAROJ JEE

Alka के द्वारा
February 25, 2014

दीपक जी, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | बधाई ..

    deepakbijnory के द्वारा
    February 26, 2014

    blog me aane hetu dhanyawaad alka ji isi prakar tsah badate rahiye

Ritu Gupta के द्वारा
February 25, 2014

बहुत खूबसूरत रचना बधाई दीपक जी

    deepakbijnory के द्वारा
    February 25, 2014

    dhanyawad aadarniya ritu ji

sadguruji के द्वारा
February 24, 2014

बहुत अच्छी रचना.आपको बहुत बहुत बधाई.ये पंक्तियाँ बहुत बेहतरीन हैं-सो जाता वो भी बदहवास चादर को तानकर बेटी जो उसके घर में भी जवान न होती धर्म की ही आड़ में जो न होता कत्लेआम गाँव की ये गलियां यूं वीरान न होती

    deepakbijnory के द्वारा
    February 25, 2014

    dhanyawaad aadarniya sadguru ji isi prakar blog me aakar margdarshan dene ka aabhari hoon sadar dhanyawaad

    deepakbijnory के द्वारा
    February 24, 2014

    dhanyawaad aadarniya yogi jo apne apna bahumulya samay nikalkar meri kavita par manthan kiya aur ise sarahniya banaya

ranjanagupta के द्वारा
February 24, 2014

दीपक जी !बहुत बधाई !बहुत अच्छी रचना ,और भाव !

    deepakbijnory के द्वारा
    February 24, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA RANJANA JI ISI TARAH APNA SNEH BANAYE RAKHIYE BAS EK BADI BEHEN KI TARAH MARGDARSHAN KA AABHAARI HOON SADAR

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 22, 2014

     जीवन के म्रदुल एवं कटु अनुभवों पर बहुत सरल एवं सटीक अभिव्यक्ति ,अच्छी रचना ,सादर बधाई दीपकजी .

    deepakbijnory के द्वारा
    February 24, 2014

    AADARNIYA NIRMALA JI HAUSLA BADANE KE LIYE DHANYAWAD ISI TARAH APKA SNEH AUR MARGDARSHAN BANA REHNA CHAHIYE

jlsingh के द्वारा
February 22, 2014

बहुत अच्छी रचना आदरणीय दीपक जी …बहुत बहुत बधाई!

    deepakbijnory के द्वारा
    February 24, 2014

    DHANYA WAAD AADARNIYA J L SINGH SAHAB जो आप जैसे UMDA LEKHAK MERE BLOG पर पधारे आपकी TIPPANI KA KOTI KOTI DHANYAWAD

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 22, 2014

गाँव की ये गलियाँ यूं बीरान न होती ! वाह अति सुन्दर प्रस्तुति मान्यवर दीपक जी ! बधाई !

    deepakbijnory के द्वारा
    February 24, 2014

    ्dhanyawad aadarniya vijay ji jo aapne meri kavita ko saraha meri kavita ka maan bad gaya jo aap jaise kalakar ne is par manthan kiya

kavita1980 के द्वारा
February 21, 2014

आभारी हूँ  दीपक जी संदर्भ समझाने के लिए -सही है सीमाओं का अतिक्रमण ही समस्त समस्याओं के मूल में है –आँय रचनाओं पर भी आप की टिप्पणियों की आकांक्षी हूँ – धन्यवाद

    deepakbijnory के द्वारा
    February 21, 2014

    aadarniya kavita ji aabhari hoon apka jo apne meri kavita par manthan shankaon par prashn kiya aur meri baat ko smjha yah sab ek parkhi insaan hi kar sakta hai sadar naman

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 21, 2014

बागबान के ही हाथों मसले जाने से बच ही जाती वो जोश में गर इस कदर नादान न होती आदरणीय दीपक जी काश लोग स्त्रियों का सम्मान करना सीखें समाज उज्जवल होगा और गलियां वीरान भी नहीं ..सुन्दर रचना एक सच को उजागर करती … भ्रमर 5

    deepakbijnory के द्वारा
    February 21, 2014

    aadarniya surendra ji sukh wahee hai jahan naari pooji jaati hai kavita padne ke liye dhanyawad

yamunapathak के द्वारा
February 21, 2014

न आती सर्द हवा और न होता ये पतझर बागान को बसंत की पहचान न होती दीपक जी यह और अंतिम पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.भपूर्ण अभिव्यक्ति है

    deepakbijnory के द्वारा
    February 21, 2014

    dhanyawad aadarniya yamuna jo aap jaise vidwan lekhika ki parkhi najaron ne meri kavita par manthan kiya protsahan ke liye dhanyawad

kavita1980 के द्वारा
February 20, 2014

अच्छी रचना -परंतु स्त्री के विषय में जो कहा आपने वो कुछ समझ नही आया ।( बागबान —-दुकान न होती )

    deepakbijnory के द्वारा
    February 20, 2014

    aadarniya kavita ji akele mumbai me 75ooo bar balayein hain internet me jism ka poora sansar hai ye jism ki dukaan naheen to aur kya hai aarushi case me apni nadani ki vajah se bagban ke hi haathon maari gayi

sanjay kumar garg के द्वारा
February 20, 2014

अच्छी रचना के लिए आभार! आदरणीय दीपक जी!

    deepakbijnory के द्वारा
    February 20, 2014

    dhanyawad aadarniya sanjay ji meri kavita par manthan ke liye kripya isi prakar blog par kar dishanirdesh dekar utsahvardhan karte rahen sadar

vaidya surenderpal के द्वारा
February 19, 2014

धर्म की ही आड़ में जो न होता कत्लेआम गाँव की ये गलियां यूं वीरान न होती बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित कविता दीपक जी, बधाई ।

    deepakbijnory के द्वारा
    February 20, 2014

    dhanyawad aadarniya surendrapal ji meri kavita ki sarahna ke liye

deepakbijnory के द्वारा
February 19, 2014

please read it deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/19/पीड़ा-गर-घर-में-मेरे-मेहमान/

    Ashutosh Shukla के द्वारा
    April 5, 2014

    वाह…बहुत सुन्दर भाव समेटे दीपक सर ….ह्रदय को छू गयी आपकी पंक्तियाँ.. “पीड़ा गर घर में मेरे मेहमान न होती”


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