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फतह का जश्न मनाता तो मनाता कैसे (ग़ज़ल)

Posted On: 27 Apr, 2014 Others,कविता,Junction Forum में

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खुद से ही जीता हूँ और खुद से ही हारा हूँ
फतह का जश्न मनाता तो मनाता कैसे
ख़ुशी में तुझको भूलने की मेरी फितरत है
ग़मों में तुझको बुलाता तो बुलाता कैसे
अपने कल की खातिर ही तुझसे दूर हुआ
अपने आज को सजाता तो सजाता कैसे
मिटाना खुद को है खातिर खुदा को पाने की
अहम को अपने मिटाता तो मिटाता कैसे
तम जो होता तो एक दीप ही जला दिया होता
खुद ” दीपक ” हूँ तले से अँधेरा हटाता कैसे



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
May 1, 2014

दीपक जी बहुत ही सारगर्भित पंक्तियाँ है साभार

    deepak pande के द्वारा
    May 2, 2014

    dhanyawaad aadarniya yamuna jee aapkee blog me tippanee ka arth hai ki rachna safal hui aapka kavita manthan se me kritharth hua pratiyogita me sarva sshreshta chune jaane par badhai

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 30, 2014

खुद से ही जीता हूँ खुद से ही हारा हूँ ,फतह का जश्न मनाता तो मनाता कैसे,बहुत खूब दीपक भाई ,कई बार लम्बी कविता कुछ नहीं कह पाती और आपकी ये छोटी सी  क्रिस्प रचना  जज्वातों की नमी से सराबोर है ,बहुत सुन्दर ,हार्दिक बधाई .

    deepak pande के द्वारा
    May 1, 2014

    dhanyawaad aadarniya behan aapko meri kavita me mere zazbat nazar aaye iska bahut bahut shukriya aapka sadar naman

nishamittal के द्वारा
April 30, 2014

सुन्दर अभिव्यक्ति अपने कल की खातिर ही तुझसे दूर हुआ अपने आज को सजाता तो सजाता कैसे

    deepak pande के द्वारा
    May 1, 2014

    धन्यवाद आदरणीय निशा जी मेरे ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी का मेरे लिए बहुत महत्व है शब्दों पर मंथन करने और अभूतपूर्व टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

sanjay kumar garg के द्वारा
April 29, 2014

“खुद से ही जीता हूँ और खुद से ही हारा हूँ फतह का जश्न मनाता तो मनाता कैसे” सुन्दर “सारगर्भित” रचना के लिए बधाई! आदरणीय दीपक जी!

    deepak pande के द्वारा
    April 29, 2014

    dhanyawaad aadarniya sanjay garg जी मेरे पास अपने सामान देने को विस्तृत जानकारियां तो नहीं हैं अपनी ही धुन में जो आता है लिह देता हूँ बस ये कहूँगा साड़ी लड़ाई जीवन में अपने आप से ही तो है और खुद को ही जीतना है

kavita1980 के द्वारा
April 28, 2014

छू गई ये रचना दीपक जी —   तम जो होता एक दीप जला दिया होता  खुद दीपक हूँ तले से अंधेरा हटाऊँ कैसे — ——बहुत खूब

    deepak pande के द्वारा
    April 29, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA KAVITA JEE जो आपने मेरे मन में बसी कविता की गहराई को समझा आपका सादर AABHAAR

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
April 27, 2014

बहुत सटीक व् सार्थक रचना .बधाई

    deepak pande के द्वारा
    April 28, 2014

    dhanyawaad aadarniya shikha jee blog me aane evam sarahana ke liye


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