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माँ अपने ही बच्चोँ के सर पे बोझ हो गयी [कविता](मदर डे)

Posted On: 7 May, 2014 कविता,Junction Forum में

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माँ

उन बच्चोँ के सर से पिता का

हट गया जो साया था

अचानक अपने आप को सभी ने

मुफलिसी मेँ पाया था

माँ अपने आप को इस

परिस्थिती मेँ ढालती रही

अपना पेट काट उन

बच्चोँ को पालती रही

वही माँ आज सभी दुखोँ की

वजह ए दोष हो गयी

न जाने कैसे अपने ही बच्चोँ के

सर पे बोझ हो गयी

एक छोटे से कमरे मेँ सभी को

पाल कर बडा किया

नन्हीँ लताओँ हेतु आय का

स्तम्भ खडा किया

आज उन बच्चोँ के बडे घरोँ माँ के लिए

कोई न जगह थी

साथ माँ को अपने रखने की

कोई न वजह थी

अपनी ही माँ कैसे दुखोँ का

कोष हो गयी

न जाने कैसे अपने ही बच्चोँ के

सर पे बोझ हो गयी

दीपक पाँडे नैनीताल



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
May 9, 2014

“पूत कपूत सुने बहुतेरे, माँ न सुनी कुमाता” वास्तव में माँ “ईश्वर” का दूसरा रूप होता है! सुन्दर रचना साभार! पांडेय जी!

    deepak pande के द्वारा
    May 9, 2014

    dhanyawaad aadarniya sanjay jee bas jo dekha aas pass wahi likh diya hausla badane ke liye shukriya

deepak pande के द्वारा
May 8, 2014

धन्यवाद आदरणीय विजय जी आप जैसे उम्दा lekhak का मेरे ब्लॉग पर पधारना hee मेरे liye prerna का स्रोत है सादर धन्यवाद

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 8, 2014

आदरणीय दीपक पाण्डे जी , सादर अभिवादन ! यथार्थ का सही चित्रण इस कविता का आधार है ! हार्दिक बधाई !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 7, 2014

आज उन बच्चों के बड़े घरों में माँ के लिए कोई न जगह थी ,माँ को साथ रखने की कोई न बजह थी ,बहुत सही लिखा है दीपकजी ,हर दुसरे घर की यही कहानी है ,सत्य को उजागर करती कविता ,सादर बधाई

    deepak pande के द्वारा
    May 8, 2014

    dhanyawaad aadarniya nirmalaa jee kavi kee kalpanaon se pare yahee aaj kee maa kee sachchai mujhe aaj samaj me najar aayee


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