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बिना छाँव का मैँ सूखा सा दरख्त रहा(ग़ज़ल)

Posted On: 14 May, 2014 Others,कविता,Junction Forum में

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अब न ताज रहा न ही कोई तख्त रहा
बिना छाँव का मैँ सूखा सा दरख्त रहा

नशा तरक्की मुझ पर यूँ चढा जालिम
एक कठपुतली सा मैँ बेजुबान भक्त रहा

अपने भी उसूल थे अपनी भी कोई इज्जत थी
अपने जमाने मेँ मैँ आदमी बडा सख्त रहा

स्वार्थवश मैँने वहशियोँ को भी माफ किया
मैँ मसीहा था मेरा भी एक वक्त रहा

सामने पडा जो आईना तो ये मंजर देखा
खाली था आईना मेरा न कोई अक्स रहा

अपनोँ मेँ खो गया इतना कि हुआ तन्हा
दर्द और पीडा का मुझसे न कोई रब्त रहा

दीपक पाण्डेय नैनीताल



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

swadhapandey के द्वारा
May 31, 2014

सुन्दर अभिव्यक्ति खली था आइना मेरा न कोई अक्स रहा ………..

    deepak pande के द्वारा
    June 3, 2014

    dhanyawaad aadarniya swadha jee blog me padharne hetu sadar aabhaar

sanjeevtrivedi के द्वारा
May 18, 2014

दीपक जी बहुत खूब…

    deepak pande के द्वारा
    May 18, 2014

    dhanawaad aadarniya sanjeev jee blog me aane aur sarahna ke liye

ranjanagupta के द्वारा
May 17, 2014

बहुत सुन्दर शब्दों की रचना ! प्रभावशाली भाव विन्यास !बधाई !सादर !!

    deepak pande के द्वारा
    May 17, 2014

    dhanyawaad आदरणीय रंजना रचना की सराहना के लिए धन्यवाद आपकी सराहना मेरे लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन है

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 17, 2014

दीपक जी सुन्दर रचना जिंदगी ऐसे भी बहुत से रंग दिखाती है क्या से क्या हो जाता है ..खली था आइना मेरा … भ्रमर ५

    deepak pande के द्वारा
    May 17, 2014

    AADARNIYA SURENDRA JEE SADAR प्रणाम कविता पर मंथन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

sanjay kumar garg के द्वारा
May 17, 2014

बिना छाँव का मैँ सूखा सा दरख्त रहा…. सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय दीपक जी!

    deepak pande के द्वारा
    May 17, 2014

    धन्यवाद आदरणीय संजय जी रचना पर टिप्पणी हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सादर नमन


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