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जीवन का संगीत

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पावन नदी थी उस युग में इस युग में नाली हो गयी (गंगा माँ)

Posted On: 3 Jul, 2014 कविता,Junction Forum,Hindi News में

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सृजित हुई विष्णु के अंगुष्ठ से ब्रह्म कमंडल में विचरण हुआ
तप से भगीरथ के प्रसन्न हो मृत्युलोक में आगमन हुआ
आयी थी प्रचंड उद्वेग से तो धरती में भी कम्पन हुआ
जटा में समाई शिव के जब नीलकंठ का वंदन हुआ
लट खोली तब महेश ने धरा पर मेरा अवतरण हुआ
पावन नदी थी उस युग में इस युग में नाली हो गयी
अपने ही कपूतों के कपट से मैं गंगा काली हो गयी
…………………………………………………………….
गोमुख के हिमनद से निकल स्वच्छंद मैं बढ़ती चली गयी
गुजरी मैं जिस स्थान से मानव सभ्यता बसती चली गयी
तुमने दर्जा दिया माँ का मुझे मेरा हर वक़्त नमन किया
ईश्वर की अर्चना में जल से मेरे ही तुमने आचमन किया
पानी से मेरे सींच कर अपने खेतों का सृजन वहीं किया
सभी गन्दगी और मल मूत्र का भी विसर्जन वहीं किया
आयी थी फिर मैदान में उद्योगो का हुआ फिर विस्तार
ज़हरीले रसायनों का मुझमे प्रचंड तब किया गया प्रहार
मेरी सहयोगी नदियां भी मुझसी गन्दगी से भरपूर थी
मुझमे समाने के लिए वो भी किस कदर मजबूर थी
सभी प्रदूषणों से मिल मैं विष की प्याली हो गयी
अपने ही कपूतों के कपट से मैं गंगा काली हो गयी
………………………………………………………
आस्था के नाम पर मेरी सब आरती उतारते
फूल पत्ती,गन्दगी,पॉलिथीन सब मुझपे वारते
जो जीवित हैं वो जल से मेरे जीवन पाते हैं
जो मृत हुए जीव जंतु मुझमे ही समाते हैं
जनसँख्या थी जब कम ये सब झेलती रही
अब मेरी सहन शक्ति की भी सीमा नहीं रही
मेरे ही जल को इस तरह जो प्रदूषित करोगे
उसी जल के सेवन से अपने तन रोगों से भरोगे
सम्भलों अब खुद भी और मुझे भी सम्भालो
अब और गन्दगी को न मेरे जिस्म पे डालो
फिर न कहना क्यूँ गंगा कोप में मतवाली हो गयी
अपने ही कपूतों के कपट से मैं गंगा काली हो गयी
………………………………………………………….
सहनशक्ति का मेरे अब तुम लो न इम्तिहान
मिल बैठ कर समस्या का निकालो कुछ निदान
मल और दूषित जल के शुद्धि का चला अभियान
मेरी समस्या को सुलझा करो मेरा भी कल्याण
जब मैं ही मिट गयी तो फिर कैसे निभाओगे
आने वाली नस्लों को फिर क्या पिलाओगे
अनवरत मुझको बहने दो न उद्वेग को रोको
मुझमे ही रहने दो मुझे न मेरे संवेग को रोको
समाहित न करो कुछ मुझमे यही मेरी आरती
आज तुमसे निवेदन करती ये गंगा माँ भारती
दुनिया ये कहने लगे शुद्ध जल वाली हो गयी
सारे जहां की नदियों से निराली हो गयी

दीपक पाण्डेय
जवाहर नवोदय विद्यालय
नैनीताल



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 14, 2014

दीपक जी गंगा पर आधारित यह कविता बहुत ही सुन्दर है और चेतना भी जगाती है अच्छा है मोदी जी ने अभी इसे साफ़ करवाने का जिम्मा लिया है कुछ तो सकारात्मक अवश्य होगा जन चेतना को जगाती इस रचना के लिए धन्यवाद साभार

    deepak pande के द्वारा
    July 14, 2014

    dhanyawaad aadarniya aapka mere blog me aana me to aaj hee pavitra ho gayaa aap jaisi umda lekhak kaa mere blog par tippani hee mere liye protsahan hai

sadguruji के द्वारा
July 11, 2014

बहुत शिक्षाप्रद और उपयोगी कविता ! मुझे बहुत अच्छी लगी ! बहुत बहुत बधाई !

    deepak pande के द्वारा
    July 13, 2014

    dhanyawaad aadarniya sadgurujee

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
July 10, 2014

मेरी समस्या को सुलझा करो मेरा भी कल्याण जब मैं ही मिट गयी तो फिर कैसे निभाओगे आने वाली नस्लों को फिर क्या पिलाओगे अनवरत मुझको बहने दो न उद्वेग को रोको प्रिय दीपक जी सुन्दर भाव और सुन्दर सन्देश लिए अच्छी रचना जल ही जीवन है आइये माँ गंगा को उनके रूप में शुद्ध पूज्य ही रखें भ्रमर ५

    deepak pande के द्वारा
    July 10, 2014

    dhanywaad aadarniya surendra jee kavita me aapka samarthan paa mai anugrahit hua saadar aabhaar

pkdubey के द्वारा
July 7, 2014

सर,सादर आभार और बधाई.

    deepak pande के द्वारा
    July 7, 2014

    dhanyawaad aadarniya doobey jee

..माँ गंगा की व्यथा को बहुत ही प्रभाव पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है आदरणीय दीपक जी माँ गंगा ने तो सदा ही हमारे पापों को धोया है अब समय की मांग है कि हम उन्हें अपने पापों से मुक्त करे…..सुंदर प्रस्तुति सादर ..

    deepak pande के द्वारा
    July 7, 2014

    theek kaha shilpa jee ab jan jan ko jagna hoga aur ganga maa kee vyatha ko door karna hoga

Ritu Gupta के द्वारा
July 5, 2014

ेसुन्दर व् सरल शब्दों में सच्ची ब्या करती उत्तम कविता

    deepak pande के द्वारा
    July 7, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA REETU JEE BLOG ME AANE KE LIYE SADR AABHAAR

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 5, 2014

दीपक पण्डे जी ,कुपुत्र भी हूँ अगर बुरा मैं बुरी न माता कभी हुयी है …माँ कभी बुरी नहीं हो सकती वह गुणगान की ही अधिकारी है वह श्रद्धा ,आश्था की अधिकारी है ….अपने पाप को छुपाने के लिए हम माँ  का अपमान सह रहे हैं  एक कवि तो आरती ही करता है माॅ यदि बूडी कुरूप हो जाये तो क्या सम्मान गुणगान की अधिकारी नहीं रहती ओम शांति शांति …एक माॅ का कारुणीक दर्द बधाई 

    deepak pande के द्वारा
    July 8, 2014

    रचना पर टिप्पणी ke लिए आभार आदरणीय श्री harish चन्द्र जी आपकी टिप्पणी मेरे लिए प्रोत्साहन है

Shobha के द्वारा
July 5, 2014

अति सुंदर कविता हेडिंग भी बहुत अच्छा है बड़ी खूबसूरती से आपने माँ गंगा का उद्गम दर्शाया है फिर बढ़ती सभ्यता अति शहरी करण ने माँ का क्या हाल किया अति सुन्दर भाव भला हो आपका कविता के माध्यम से जनता को माँ का महत्व समझाया शोभा

    deepak pande के द्वारा
    July 7, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA SHOBHA JEE AAPKEE SARAHNA MERE LIYE PROTSAHAN KAA SABAB LEKAR AATA HAI


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