CHINTAN JAROORI HAI

जीवन का संगीत

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एक खत उस अनजान रिश्ते के नाम (रक्षा बंधन)

Posted On: 8 Aug, 2014 कविता,Junction Forum,Special Days में

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वो कौन सी तड़प थी वो कौन सा सुकून था
हर रोज़ तुमसे मिलने का मुझको जूनून था
उन संघर्ष के दिनों में बस गम ही तो पाता था
उन दुखों के मरहम को तुम्हारे ही पास आता था
तरक्की की कसौटी पर जब दुनिया परखती थी
वो तुम ही तो थी जो मुझे हर पल समझती थी
अपने आप में सिमट के मैं गुमसुम सा रहता था
तुम्हारे ही समक्ष तो सब दिल से कहता था
दुश्वारियों से तुमने ही तो मुझको निकाला था
जब भी सफर में भटका तुमने ही संभाला था
अब भी तो सारी खुशियाँ तुमसे बांटता हूँ मैं
तुमसे बाँट खुशियाँ, सुखों को तलाशता हूँ मैं
ये रिश्ता ये ज़माना कहाँ समझ पायेगा
सोचेगा कुछ अलग कुछ और ही बताएगा
जीवन के इस पड़ाव में ये देता हूँ मैं पैगाम
विचारों के गहन मंथन का ये ही है अंजाम
तुम्हारे मेरे बीच जो ये अद्भुत सा है किस्सा
न आता नज़र रक्षा बंधन का है ये रिश्ता

दीपक पाण्डेय
नैनीताल



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 8, 2014

दीपक जी , वाह…बेहद सुन्दर भावपूर्ण कविता । ऐसे ही लिखते रहें । इस तरह का रचनाकर्म मन को छूता है । बधाई आपको ।

    deepak pande के द्वारा
    August 8, 2014

    dhanyawaad आदरणीय बिष्ट जी यूँही आपका मार्गदर्शन बना रहेगा तो मई भी आपसे प्रेरणा पाकर लिखता रहूंगा सादर आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 8, 2014

भाई बहन का रिश्ता कितना आत्मीय एवं पवित्र होता है ,वो भावनाएं कविता की हर पंक्ति बतला रही है ,आप को रक्षा बंधन की शुभ कामनाएं .

    deepak pande के द्वारा
    August 8, 2014

    DHANYAWAAD AADARNIYA NIRMALA DIDI APKO RAKSHA BANDHAN PAR IS BHAI KEE OR SE BADHAI ISEE PRAKAAR APNE IS BHAI KA HAUSLA BADATE RAHIYEGA


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