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मासूम नस्ल को वो बन के खरपतवार खा गए(कविता)

Posted On: 22 Dec, 2014 Others,कविता,Junction Forum में

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जो बिखेरे थे फ़िज़ाओं में चन्द नफरतों के बीज
मासूम नस्ल को वो बन के खरपतवार खा गए
…………………………………………………..

क़त्ल और वहशियत को धर्म कहने लगे हैं लोग
धर्म को सियासत औ धर्म के ठेकेदार खा गए
…………………………………………………….

सड़कों में तड़पती रही वो औरत की नग्न देह
करके आबरू उसकी गिद्ध तार तार खा गए
………………………………………………….

सुचना तंत्र में संस्कार की अब दिखती नहीं झलक
विज्ञापन औ चलचित्र, अश्लीलता के संसार खा गए
……………………………………………………..

पैरों से कुचले जाना ही जिनका होता रहा है ह्स्र
गुलशन को वो फूल बन के आज खार खा गए
…………………………………………………

इस पार जो कहलाते हैं सौदागर मौत के
वज़ीर बन के आज वो उस पार आ गए
……………………………………………

सिखाया था जिसको बेरहमी से क़त्ल करने का हुनर
वो मिटा के आज उसका खुद का ही परिवार खा गए

दीपक पाण्डेय
नैनीताल



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
December 31, 2014

आदरणीय दीपक पांडेजी ! बहुत सुन्दर और विचारणीय कविता ! सर्वोत्तम प्रस्तुति के लिए आभार ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! आपकी सुन्दर और सार्थक लेखनी नववर्ष में भी यूँ ही चलती रहे !

pkdubey के द्वारा
December 23, 2014

अवश्य ही अच्छे संस्कारों से ही देश बदल सकता है आदरणीय ,प्रत्येक पंक्ति गंभीर कटु सत्य को दर्शाती| वो मिटा के आज उसका खुद का ही परिवार खा गए|.सादर साधुवाद आदरणीय .

DEEPTI SAXENA के द्वारा
December 22, 2014

बहुत बढ़िया, शब्दों के माध्यम से रूह को छू गयी कविता, सार्थक प्रयास

    deepak pande के द्वारा
    December 22, 2014

    Dhanyawaad aadarniya deepti jee blog me agman aur chintan hetu aabhaar


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