CHINTAN JAROORI HAI

जीवन का संगीत

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भू माफिया ( कविता)

Posted On: 15 Jul, 2015 कविता में

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जेठ की तपती धरा
चहुंओर हाहाकार था
व्याकुल जीव जंतु सभी
मानसून का इंतज़ार था
…………………………
मेघों की तब एक छटा
आकाश में छाने लगी
पक्षियों के आकुल कंठ में
एक आस दिखलाने लगी
………………………….
आया समय मधुमास का
प्रजनन सृजन का काल था
नव आगंतुकों के आगमन पर
एक अदद घरोंदे का सवाल था
………………………………….
मेरे आँगन भी आया एक जोड़ा
खग का बहुत क्रंदन किये
श्याम वर्ण पंखों का कुछ
बीचोंबीच नीली छटा लिए
……………………………….
गीली माटी चोंच में ले
दीवार पर चिपकाने लगे
एक करे आराम तो एक
चलता है कुछ माटी लिए
……………………………
दिख रहा था दीवार पर
आगाज़ नए संसार का
मिटटी का वो एक घरोंदा
सुराही के से आकार का
…………………………
यह क्या गौरैय्या का एक
जोड़ा भी उधर आने लगा
बने बनाये घोँसले पे उस
हक़ अपना जतलाने लगा
…………………………..
हुआ संघर्ष पखेरुओं में
अंत में यही परिणाम था
ताकतवर गौरैया का जोड़ा
अब घर उसी के नाम था
………………………………
इंसानो में अब तक सुना
भू माफिआओं का जाल है
पक्षियों में भी होने लगा ये
कलयुग की ही कुछ चाल है
……………………………..
आ रहा क्या घोर कलयुग
क्या बह रही आबो हवा
पशु पक्षियों में भी असर
कुछ हाय अब दिखने लगा

दीपक पाण्डेय
नैनीताल



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 8, 2015

अच्छी कविता है ।

    deepak pande के द्वारा
    October 8, 2015

    dhanyawaad aadarniya jitendra jee

Shobha के द्वारा
July 19, 2015

बेहद अच्छी भाव पूर्ण कविता परन्तु प्रतिक्रिया भेजने में असमर्थ हूँ

    deepak pande के द्वारा
    October 8, 2015

    dhanyawaad aadarniya shobha jee pratikriya mil gayee hai spam me chalee gayee thee mere ghar kee diwar par ye ghousla banaya tha chidiya ne so maine kavita likh dee


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