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इन बेजुबानों का क्या कोई खुदा नहीं होता

Posted On: 30 Sep, 2015 Others,कविता,Junction Forum,Religious में

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हो बलि या क़ुरबानी बस काटी जाती है गर्दन
इन बेजुबानों का क्या कोई खुदा नहीं होता
………………………………………..
बन्दे खुदा के अब खुद ही बनने लगे खुदा
ईश्वर के दर पे अब कोई सज़दा नहीं होता
……………………………………………
धार्मिक उन्माद में हर कोई शख्श सराबोर है
युवाओं में देशप्रेम का अब जज़्बा नहीं होता
……………………………………………….
धर्म के नाम पर अब महज़ होता है कत्लेआम
डर से खुदा के अब कोई ख़ौफ़ज़दा नहीं होता
…………………………………………………..
मुनासिब नहीं है यूं मासूम जीवों का क़त्ल
विरोध में यूं क़त्ल भी सही रस्ता नहीं होता

दीपक पान्डे
नैनीताल



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 8, 2015

हृदयविदारक कविता लिखी है दीपक जी आपने । कौन सुने इन मासूमों को ? काश इनका भी कोई वोट बैंक होता तो शायद इनका ख़ामोश दर्द भी किसी तक पहुँच जाता । कोई राजनीति करने वाला इनकी भी सुध ले लेता ।

    deepak pande के द्वारा
    October 8, 2015

    dhanyawaad aadarniya jitendra jee blog me aane hetu samay nikalne ke liye dhanyawaad

sadguruji के द्वारा
October 7, 2015

हो बलि या क़ुरबानी बस काटी जाती है गर्दन इन बेजुबानों का क्या कोई खुदा नहीं होता ! आदरणीय दीपक पांडे जी ! मन को छूने वाली बहुत प्रभावी रचना ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    deepak pande के द्वारा
    October 8, 2015

    dhanyawaad aadarniya sadgurujee blog hetu apna amulya samay nikalne ke liye mere comment pata nahee kyoon spam me chale jaa rahe hain aapke comment bhee spam me hee milrahe hain

Shobha के द्वारा
October 4, 2015

श्री पाण्डेय जी आपने जिन विचारों को पंक्तियों में उतारा हैं हो बलि या क़ुरबानी बस काटी जाती है गर्दन इन बेजुबानों का क्या कोई खुदा नहीं होता हम सबको बुरा लगता हैं मन दुखता है परन्तु क्या करें

    deepak pande के द्वारा
    October 8, 2015

    dhanyawaad aadarniya shobha jee ye bali ya kurbaani jaisi kureetiyaan aaj bhee hamare sabhya samaaj me chal rahee hain


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