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जयचंदों के बीच खड़ा हूँ फिर भी लहराता जाता हूँ (कविता)

Posted On: 8 Jan, 2016 Others,कविता,Junction Forum में

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जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
मानव रुपी गिद्धों को एक
अबला को नोंच खाते देखा
क़ानून की लाचारी के आगे
वहशी दरिंदे को मुस्काते देखा
सुन उस अबला की चीखों की गूँज
मैं अपने आप लजाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………

बच्चे बूढ़े महिलाओं को
ट्रेन में ज़िंदा जलते देखा
मानवता के हत्यारों की खातिर
असमय कोर्ट खुलते देखा
बुद्धिजीवियों को गद्दारों की
पैरवी करते पाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
दादरी ह्त्या को दिखलाया ऐसे
मुल्क को मेरे बदनाम किया
मालदा की अराजकता से सारे
मीडिया तंत्र ने ही मुँह मोड़ लिया
मुल्क के इस चौथे स्तम्भ को देख
शर्मिंदा मैं होता जाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
चार वर्ष की बच्ची जब
पिता की चिता स्वयं जलाती है
जान मैं दूँगी वतन की खातिर
ऐसा अक्सर बतलाती है
नमन शहीदों को करता हूँ
उनकी गाथा सुनाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
शपथ ले भ्रष्टाचार दमन की
आम आदमी सत्ता में आता है
भूखे गरीब का पेट काट अपना
वेतन चार गुना बढ़ाता है
आम से ख़ास बनने का तमाशा
आज सबको दिखलाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
बेघर हुए अपने ही कश्मीर में
अपनों के ही द्वारा गए लूटे
हाय इन बुद्धिजीवियों के मुँह से
दो भी बोल नहीं फूटे
लौटाए सम्मान सभी जो
चाटुकारिता करके लूटे
दिया सम्मान क्यूँ ऐसे गद्दारों को
ये सोच के मैं पछताता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
गरीबी रेखा के नीचे रहना
अपना आधार समझता है
सत्रह बच्चे पैदाकर सुविधाओं पर
क्यूँ अपना अधिकार समझता है
विकास में योगदान शून्य पर
जनसंख्या को बढ़ता पाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
षड़यंत्र जाल जहां स्वयं ही
जनता द्वारा बुना गया
पढ़े लिखे मतदाता द्वारा
अनपढ़ नेता चुना गया
चारा खाने वाले इंसान को
सिंहासन पे बैठता पाता हूँ
जयचंदों के बीच खड़ा हूँ
फिर भी लहराता जाता हूँ
…………
दीपक पाण्डेय
नैनीताल



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ravindra K Kapoor के द्वारा
February 1, 2016

दीपक पान्डे जी आपने तो गागर में सागर भर दिया. इतनी सुन्दर रचना के लिए साधुवाद. कृपया बहुत दिनों के अंतराल के बाद इस मंच पर आपने के लिए छमा. सुभकामनाओं के साथ ..रवीन्द्र के कपूर

    deepak pande के द्वारा
    February 2, 2016

    dhanyawaad aadarniya ravindra jee blog me aapka swaagat hai

harirawat के द्वारा
January 22, 2016

दीपक जी, बहुत सुन्दर तथ्यों में लिपटी हुई कविता, साधुवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

    deepak pande के द्वारा
    February 2, 2016

    dhanyawaad aadarniya rawat jee kavita par manthan hetu dhanyawaad

sadguruji के द्वारा
January 12, 2016

जयचंदों के बीच खड़ा हूँ, फिर भी लहराता जाता हूँ ! आदरणीय दीपक पाण्डेय जी ! बहुत सार्थक और भावपूर्ण कविता ! विचारणीय प्रस्तुति हेतु हार्दिक आभार !

    deepak pande के द्वारा
    January 17, 2016

    KAVITA PAR MANTHAN HETU DHANYAWAAD AADARNIYA SADGURU JEE

Shobha के द्वारा
January 10, 2016

श्री दीपक जी उत्तम विचार मालदा की अराजकता से सारे मीडिया तंत्र ने ही मुँह मोड़ लिया मुल्क के इस चौथे स्तम्भ को देख शर्मिंदा मैं होता जाता हूँ

    deepak pande के द्वारा
    January 11, 2016

    kavita par manthan hetu saadar aabhaar aadarniya shobha jee


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