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बैलगाड़ी काठ की (बाल कविता)

Posted On: 22 Feb, 2017 कविता में

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बैलगाड़ी काठ की
होगी मस्ती ठाठ की
नानी के गांव छुट्टी में
ऐश दिन और रात की
मेला इसी मैदान में
ठेली होगी चाट की
मिलजुल कर सब खेलेंगे
उम्र पच्चीस की या साठ की
अपनी ही धुन में नाचेंगे
न फिक्र मम्मी की डांट की
न कोई बात किताबों की
न सोलह दूनी आठ की
बाद दिन भर की थकान के
होगी जरुरत खाट की
स्वप्न में लीला अनोखी
परियों के पंचाट की
फिर से एक सुबह अनूठी
नयी नयी सौगात की

दीपक पाण्डेय
जवाहर नवोदय विद्यालय
नैनीताल



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka के द्वारा
March 2, 2017

आदरणीय दीपक जी, बहुत खूब .बचपन याद आ गया . वाकई नानी के घर जाये बिना तो छुट्टियां पूरी ही नहीं होती थी |

    deepak pande के द्वारा
    March 4, 2017

    धन्यवाद आदरणीय अलका जी

sadguruji के द्वारा
March 1, 2017

आदरणीय दीपक पांडे जी ! बचपन की याद दिलाती इस सुन्दर और पठनीय कविता की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! सादर आभार !

    deepak pande के द्वारा
    March 4, 2017

    धन्यवाद आदरणीय सतगुरु जी

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
February 28, 2017

आदरणीय दीपक पांडेय जी बहुत सुंदर कविता । मन को छूती हुई । उम्र पच्चीस की या साठ की अपनी ही धुन में नाचेंगे न फिक्र मम्मी की डांट की न कोई बात किताबों की……………बहुत खूब ।

    deepak pande के द्वारा
    March 4, 2017

    धन्यवाद आदरणीय बिष्ट जी


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