CHINTAN JAROORI HAI

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गांधीजी के तीन बंदर और पद्मावत

Posted On: 25 Jan, 2018 Junction Forum में

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आज देश में चारों ओर पद्मावत फिल्म का विरोध हो रहा है। सवाल यह उठता है की आखिर यह विवादित फिल्म बनती ही क्यूँ हैं, जिनमें इतिहास को स्वार्थवश तोड़ मरोड़ कर दिखाया जाता है और खलनायक का नायक की भाँती महिमामंडन किया जाता है। अभी एक फिल्म टाइगर जिन्दा है में भारत की रॉ तथा पकिस्तान की आई एस आई एजेंसी को साथ मिलकर कार्य करते दिखाया गया है जो की सरासर झूठ से ज्यादा कुछ नहीं।


Padmavati


एक ज़माना था जब डायरेक्टर ऐतिहासिक फिल्म बनाने से घबराते थे या महंगी फिल्म बनाने पर घर तक गिरवी रख देते थे और फिल्म की पटकथा पर बहुत मेहनत करते थे क्यूंकि फिल्म पर उनके जीवन भर की कमाई टिकी होती थी।  मगर फिर एक ऐसा दौर आया की बॉलीवुड की फिल्म में माफिया अपना पैसा लगाने लगा तथा अपनी काली कमाई को सफ़ेद करने लगा। अस्सी के दशक में एक फिल्म में तो एक माफिया स्मगलर को नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया। वास्तव में यह एक स्मगलर की सच्ची कहानी थी तथा डायरेक्टर को उसके लिए पूरी रकम भी अदा की गयी थी।


इस प्रकार धीरे धीरे फिल्म जगत में अंडरवर्ल्ड का पैसा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लगने लगा तथा डायरेक्टर की पैसे की फिक्र ख़त्म हो गयी फलस्वरूप फिल्मो का स्तर भी गिरने लगा। अब डायरेक्टर के लिए फिल्म का चलना या न चलना कोई चिंता का विषय नहीं रह गया। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण राम रहीम द्वारा बनाई फिल्म है जो क़ि हिट न होने के बावजूद भी मुनाफा दिखा रही थी। क्यूंकि सारे डिस्ट्रीब्यूटर को पैसा देकर स्वयं बाबा राम रहीम ने काळा धन को सफ़ेद किया अब फिल्मे काळा धन को सफ़ेद करने का साधन बन गयी कहानी से तो कोई मतलब ही नहीं रह गया।


एक नया तरीका और ईज़ाद किया गया सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए फिल्म को विवादित बना देना। फिल्म में कुछ भी झूठ या मसाला डालकर फिल्म को विवादित बना देना इसके लिए परोक्ष रूप से विरोध करने वाले को भी एक निश्चित रकम मुहैय्या करा दी जाती है और जनता मूर्ख बनकर फिल्म देखने पहुँच जाती है फिल्म में नैतिक मूल्यों का तो कोई जिक्र करने की जरूरत तो रह ही नहीं गयी है।


अब मैं गांधी जी के तीन बंदर वाले नैतिक मूल्यों का पालन कर इस समस्या के समाधान का जिक्र करना चाहूंगा। यदि हम पहले बंदर की भाँति ऐसी घटनाओं का जिक्र ही न करें और मौन रहकर आत्ममंथन करें क़ि क्या फिल्मों के लिए यही मुद्दे बाकी रह गए हैं। क्यूँ कन्या भ्रूण हत्या , बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ ,देश भक्ति जैसे मुद्दों पर फिल्म नहीं बनती। ऐसी विवादित फिल्मों को देखना तो क्या इनके बारे में चर्चा भी न करें तो विवादों की यह श्रंखला यूं ही टूट कर रूक जाएगी और एक समय ऐसा आएगा डायरेक्टर ऐसी फिल्मे बनाना ही छोड़ देंगे।


दूसरे बंदर की भाँती हम ऐसी घटनाओं के बारे में कान ही बंद कर लें और इस विषय में कुछ भी न सुनें और इसे सुनकर अपने अवचेतन मन में नकारात्मकता का प्रवेश ही न होने दें तो हम इन विवादों द्वारा फैलने वाली नकारात्मक मानसिकता से होने वाली हिंसा से अपने आपको रोक सकेंगे।


तीसरे बंदर की तरह हम इस घटना से सम्बंधित कोई खबर ही न देखें तथा इस मीडिया को अपनी टी आर पी बढ़ाने का मौका ही न दें और ऐसी नकारात्मकता फ़ैलाने में मीडिया का हौसला पस्त करें तो एक हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है। ज्ञातत्व रहे ऐसी समस्याओं से गांधीजी के तीन बंदर बनकर ही निपटा जा सकता हैं जिनकी शिक्षा आज के परिप्रेक्ष्य में सबसे ज्यादा कारगर है।



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
January 28, 2018

व्यर्थ का विवाद …फिल्म को हिट करने का इससे बेहतर जरिया हो ही नहीं सकत!

Shobha के द्वारा
January 25, 2018

श्री दीपक जी कितना भी फिल्म का विरोध क्यों न हुआ हो पूरे भारतवासी जान गये रानी की गौरव गाथा साथ ही टुकड़े – टुकड़े में बटा देश था हर राज्य अपनी लड़ाई लड़ने के लिए कितना मजबूर था रानी को १६००० हजार राजपूतानियों के साथ जौहर करना पड़ा

    deepak pande के द्वारा
    January 27, 2018

    ्BILKUL SAHEE AADARNIY SHOBHA JEE

harirawat के द्वारा
January 25, 2018

दीपकजी कहाँ हैं गांधीजी के तीन बन्दर, पन्ना तो खाली है


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